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गोर बंजारों की बेटी झलकारी राणी: मातृभूमि संग्राम की रणरागिणी!

निलेश प्रभु राठोड
Phone: 9892333233
E-mail: gor.nileshrathod@gmail.com

‘History is nothing but the biography of the Great Men!’ इस दुनिया में जब भी इतिहास
लिखा गया खुद को बड़ा बनाने की कोशिश की गई. गोर बंजारों ने कभी इतिहास लिखने का प्रयास नहीं किया
जबकि वे दुनिया को जीने की राह दिखाने में ही बड़प्पण समझते रहे. यही वजह से इस कौम के महान राजाओं
का नाम इतिहास के पन्नों से हटाया गया जैसे सम्राट विक्रमादित्य, हेमू भूकिया और झलकारी राणी. इनके
साहसी और जांबाज़ इतिहास को नजरअन्दाज किया गया. झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के बारे में आप सभी ने
पढ़ा होगा, लेकिन क्या कभी झलकारी बाई का इतिहास जानने की कोशिश की! खैर उनके बारे में सबसे रोचक
बात यह है कि वो लक्ष्मीबाई की हमशक्ल थीं, जिस कारण अंग्रेज सैनिक धोखा खा जाते थे। और तो और कई
बार उन्होंने लक्ष्मीबाई के वेश में युद्ध किये और शत्रुओं को पराजित किया। 22 नवम्बर को भारत की
इसी वीरांगना का जन्मदिवस मनाया गया है। भारत सरकार ने 22 जुलाई 2001 में झलकारी बाई के सम्मान
में एक डाक टिकट जारी किया। उनकी प्रतिमा और एक स्मारक अजमेर, राजस्थान में निर्माणाधीन है। उत्तर
प्रदेश सरकार ने उनकी एक प्रतिमा आगरा में स्थापित की। लखनऊ में सिविल अस्पताल की महिला शाखा
झलकारी बाई के नाम से ही है। अफसोसनाक है कि मुख्यधारा के इतिहासकारों ने झलकारी बाई के योगदान
को बहुत विस्तार नहीं दिया।
बचपन
झलकारी बाई का जन्म 22 नवंबर 1830 को झांसी के भोजला गाँव में एक निर्धन कचरिवाल लभाणा परिवार
में हुआ था। जब वो छोटी सी थीं तभी उनकी मां जमुना देवी का निधन हो गया। उनके पिता नाम सदोवा (उर्फ
मूलचंद कोली) और माता जमुनाबाई (उर्फ धनिया) था। झलकारी बचपन से ही साहसी और दृढ़ प्रतिज्ञ बालिका
थी।  सदोवर सिंह एक सैनिक थे। उन्होंने झलकारी को एक सैनिक की तरह ही पाल-पोस कर बड़ा किया।
घुड़सवारी, तल्वारबाजी, भाला चलाने से लेकर कई प्रकार के हथियार चलाने सिखाये। इन सबके बीच
झलकारी ज्यादा पढ़ाई नहीं कर सकीं। हां एक अच्छी योद्धा जरूर बनीं। जंगल में तेंदुए से लड़ी थीं झलकारी
घर के काम के अलावा पशुओं के रखरखाव और जंगल से लकड़ी इकट्ठा करने का काम भी करती थीं। एक बार
जंगल में उसकी मुठभेड़ एक तेंदुए से हो गई। झलकारी के पास उस वक्त हथियार के नाम पर सिर्फ एक कुल्हाड़ी
थी। झलकारी ने उसी कुल्हाड़ी से तेंदुए को मार गिराया। डकैतों का अकेले किया सामना एक बार हथियारों से
लैस डकैतों ने गाँव के एक व्यवसायी पर हमला किया। साहसी झलकारी ने उनको गांव से बाहर खदेड़ दिया।
विवाह के बाद शामिल हुईं लक्ष्मीबाई की सेना में उसका विवाह रानी लक्ष्मीबाई की सेना के एक सैनिक पूरन
कोरी से हुआ। पूरन भी बहुत बहादुर था और पूरी सेना उसकी बहादुरी का लोहा मानती थी। एक बार गौरी
पूजा के अवसर पर झलकारी गाँव की अन्य महिलाओं के साथ महारानी को सम्मान देने झाँसी के किले में गयीं,
वहाँ रानी लक्ष्मीबाई उन्हें देख कर अवाक रह गईं, क्योंकि झलकारी बिल्कुल रानी लक्ष्मीबाई की तरह दिखतीं
थीं। रानी लक्ष्मीबाई झलकारी की बहादुरी के बारे में जानकर प्रभावित हुईं और दुर्गा सेना में शामिल कर
लिया। झलकारी ने यहाँ अन्य महिलाओं के साथ बंदूक चलाना, तोप चलाना और अन्य हथियारों का प्रशिक्षण
लिया। और आगे चलकर झलकारी दुर्गा सेना की सेनापति बनीं। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में झलकारी प्रथम
स्वाधीनता संग्राम में झाँसी की रानी के साथ ब्रिटिश सेना के विरुद्ध अद्भुत वीरता से लड़ते हुए ब्रिटिश सेना के
कई हमलों को विफल किया था। एक बार वे रानी के वेश में युद्ध करते हुए वे अंग्रेज़ों के हाथों पकड़ी गयीं और
रानी को किले से भाग निकलने का अवसर मिल गया। यदि लक्ष्मीबाई के सेनानायकों में से एक ने उनके साथ
विश्वासघात न किया होता तो झांसी का किला ब्रिटिश सेना के लिए प्राय: अभेद्य था। भारत का वर्तमान और
झलकारी बाई झलकारी बाई की गाथा आज भी बुंदेलखंड की लोकगाथाओं और लोकगीतों में सुनी जाती है।
झलकारी की कहाणी
ग्वालियर रोड से भोजला गाँव नजदीक था। खेतों में हरी-भरी चने की फसल लहरा रही थी। चारों तरफ रंग-
बिरंगे फूल खिले थे। प्रकृति अपने अनोखे शृंगार में थी। उन्हीं की अनुपम छटा निहारते हुए राहगीर सड़क से
उतरकर छोटे रास्ते पर आ गया था। दिन का समय था। चारों तरफ धूप फैली थी। गाँव की विराट संस्कृति का
अनूठा सौन्दर्य अपनी अस्मिता और पहचान के साथ सर्वत्र दिखाई देता था। अलग-बगल से गुजरते हुए लोग।
राहगीर कुछ के लिए अपना था और अन्य के लिए पराया, पर अजनबी नहीं था। जमीन की गन्ध जितनी बाहर
थी उतनी ही उसके भीतर भी। खेत पार कर अचानक राहगीर की निगाहें छः सात वर्षीय एक लड़की की ओर
उठ गई। उसका रंग थोड़ा साँवला था। आँखों में ढेर सारी चमक, बिखरे बाल। राहगीर ने पलभर सोचा। उसे
ध्यान आया। पहले इस लडकी को कहीं देखा है। वह व्यक्ति गाँव में दो-तीन बरस पहले भी आ चुका था। उसी
व्यक्ति ने मन में सोचा। कहीं यह सदोवा की मोड़ी तो नहीं है।
राहगीर पास आया, तो पूछ बैठा वह, ‘‘बिन्नू का कर रई ?’’
मिट्टी के ढेर पर बैठी लड़की के कानो में अनजाने व्यक्ति की आवाज पड़ी तो चौंक-सी उठी वह। उसने देखा अधेड़
उम्र का आदमी उसके पास आकर ठहर गया था।
लड़की के होंठों पर हल्की मूँछें थीं। सिर पर सफेदी बिखरी हुई थी। शरीर पर मटमैला कुर्ता और धोती, पाँव में
साधारण जूतियाँ, जो धूल-मिट्टी से अटी हुई थीं। लगता था जैसे वह काफ़ी दूर से पैदल चलकर आया हो। बिना
किसी हिचकिचाहट के तपाक से उसने कहा था, ‘‘किलौ बनाई रई हूँ।’’
पूछने वाले के मुँह से आश्चर्य से निकला, ‘‘क्या ?’’
झलकारी फिर बोली, ‘‘किलौ, तोय सुनाई नई दैरयौ।’’
उसके स्वर में थोड़ी तुर्शी थी। सुनने वाले को बुरा लगा। थोड़ा नाराजगी के स्वर में बोला, ‘‘बिन्नू तैं तो भौतई
खुन्नस खा रई। य्य तो बतला, कौन की मोड़ी है तू ?’’
झलकारी इस बार धीरे से बोली, ‘‘सदोवा मूलचन्द्र की।’’
सुनकर आगन्तुक जाने के लिए पीछे मुड़ा ही था कि वह पूछ बैठी, ‘‘हमाय बारे में पूछ लयो अपने बारे में नई
बताओ कछु।’’
जीवन परिचय
सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अग्रेंजी सेना से रानी लक्ष्मीबाई के घिर जाने पर झलकारी बाई ने बड़ी
सूझबूझ, स्वामीभक्ति और राष्ट्रीयता का परिचय दिया था। रानी के वेश में युद्ध करते हुए वे अपने अंतिम समय
अंग्रेजों के हाथों पकड़ी गईं और रानी को किले से भाग निकलने का अवसर मिल गया। उस युद्ध के दौरान एक
गोला झलकारी को भी लगा और 'जय भवानी' कहती हुई वह जमीन पर गिर पड़ी। ऐसी महान वीरांगना थीं
झलकारी बाई। झलकारी बाई का विवाह पूरन कोली नामक वीर युवक के साथ हुआ। वह भी झाँसी की सेना में
सिपाही था। पूरे गाँव वालों ने झलकारी बाई के विवाह में भरपूर सहयोग दिया। वह पूरन के साथ झाँसी आ
गई। सन् १८५७ में झाँसी पर युद्ध के बादल मंडराने लगे थे। अंग्रेजों ने झाँसी को विक्टोरिया के झंडे के नीचे
लाने के कई प्रयास किए। इस दौरान एक दिन झलकारी गौरी पूरज के अवसर पर झाँसी के किले में रानी का
आशीर्वाद लेने गई। रानी इस कोली बाला की कद काठी को देखकर काफी प्रभावित हुई। रानी को झलकारी की
बहादुरी के किस्से सुनाए गये तो उन्होंने दुर्गादल जो कि सेना की महिला शाखा थी, उसमें भर्ती कर लिया। आगे
चलकर झलकारी बाई दुर्गादल की सेनापति बनाई गई। झलकारी को तो जैसे मन की मुराद मिल गई। उन्हें
बंदूक चलाना और तोपों का प्रशिक्षण दिया गया। झलकारी इन सब में सर्वश्रेष्ठ थी। अंग्रेजों ने रानी के दत्तक पुत्र
को रियासत का वारिस मानने से इन्कार कर दिया और झाँसी को अपने अधीन करने के कुचक्र चलाने प्रारम्भ
कर दिए। स्थिति की गंभीरता को भाँप कर सेनानायक, झाँसी की जनता, रानी के साथ लामबन्द हो गए। झाँसी
अंग्रेजों को थाली में रखकर सौंपने के बजाय उनसे लोहा लेने का निर्णय लिया गया। महारानी लक्ष्मीबाई ने
कुशलता से युद्ध संचालन किया। अंग्रेजों एवं उनके देशी पिट्ठुओं को कई बार शिकस्त दी। पूरन कोली को किले
के एक द्वार की रक्षा करने का दायित्व सौंपा गया। झलकारी बाई रानी की मुख्य सहयोगी की भूमिका में थी।
कहा जाता है भारत में जयचंदों की किसी भी काल में कमी नहीं रही है। झाँसी के एक सेनानायक दूल्हेराव ने
अंग्रेजों से हाथ मिला लिया। युद्ध के निर्णायक दौर में इस विश्वासघाती ने किले का एक द्वार खोल दिया।
फलस्वरूप अंग्रेजी सेना किले में प्रवेश कर गयी। किले का पतन होते ही सेनानायकों एवं झलकारी बाई ने रानी
को सलाह दी कि वह कुछ विश्वस्त सैनिकों के साथ किले के बाहर निकल जायें। रानी ने अपने बच्चे को पीठ पर
बाँध लिया। घोडे पर सवार होकर गुप्त-मार्ग से किले से बाहर हो गई। पूरन कोली उस दुर्ग की रक्षा करते हुए
बुरी तरह घायल हो गया। झलकारी बाई जो अब रानी की भूमिका में युद्ध कर रही थी, पति के घायल होने की
सूचना पाकर विचलित नहीं हुई। उसने साहस तथा धैर्य से शत्रु का सामना किया। रानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजों की
पहुँच से दूर हो जाना चाहती थी। किले में युद्ध की कमान सँभाले झलकारी बाई रानी के वेश में अंग्रेजी सेना पर
शेरनी की तरह टूट पडी। झलकारी ने १२ घंटे तक अनवरत युद्ध किया और अंग्रेज यही समझते रहे कि उनसे
रानी ही युद्ध कर रही है। यकायक झाँसी की सेना पस्त होने लगी। झलकारी को शत्रु ने चारों ओर से घेर लिया
और बंदी बना लिया। उसे जनरल ह्यूरोज के समक्ष प्रस्तुत किया गया। वहाँ झाँसी के एक गद्दार ने पहचान
लिया। उसने अंग्रेजों को बता दिया कि यह रानी लक्ष्मीबाई नहीं बल्कि उनकी दुर्गा दल की नायिका झलकारी
बाई है। जनरल ह्यूरोज जाँबाजों का सम्मान करता था, वह उनसे बहुत प्रभावित हुआ। झलकारी की वीरता
तथा त्याग की प्रशंसा करते हुए उसने कहा - अगर भारत में स्वतंत्रता की दीवानी ऐसी दो चार महिलाएँ और
हो जायें तो अब तक बर्तानियों ने भारत में जो ग्रहण किया है, वह उन्हें छोडना पडेगा। भारत को स्वतंत्र होने से
कोई भी नहीं रोक सकता।
झलकारी बाई का अन्त किस प्रकार हुआ, इस बारे में इतिहासकार मौन हैं। कुछ लोगों का कहना है कि उन्हें
अंग्रेजों द्वारा फाँसी दे दी गई। लेकिन कुछ का कहना है कि उनका अंग्रेजों की कैद में जीवन समाप्त हुआ। अखिल
भारतीय युवा कोली राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. नरेशचन्द्र कोली के अनुसार ४ अप्रैल १८५७ को झलकारी बाई ने
वीरगति प्राप्त की। तत्कालीन इतिहासकारों ने लम्बे समय तक झलकारी बाई के योगदान को नजरअन्दाज
किया, किन्तु बुन्देलखण्ड के अनेक लेखकों ने उनकी शौर्य गाथा गाई हैं। जिनमें चोखेलाल ने उनके जीवन पर
एक वृहद् काव्य लिखा है और भवानी शंकर विशारद ने उनके जीवन परिचय को लिपिबद्ध किया है। झाँसी की
रानी का इतिहास जब-जब लोगों के द्वारा पढा जायगा, झलकारी बाई के योगदान को लोग अवश्य याद करेंगे।
इस शृखला में उत्तर प्रदेश के आगरा शहर में उनकी घोडे पर सवार मूर्ति स्थापित की गई है। लखनऊ में उनके
नाम पर धर्मार्थ चिकित्सालय प्रारम्भ किया गया है। जिससे भविष्य की भारतीय समाज की अनेक पीढयाँ उनसे
देश धर्म पर मर मिट जाने की प्रेरणा लेती रहेंगी।
रानी लक्ष्मीबाई की सेना में भर्ती
झलकारी बाई (२२ नवंबर १८३० - ४ अप्रैल १८५७) झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की नियमित सेना में, महिला
शाखा दुर्गा दल की सेनापति थीं।वे लक्ष्मीबाई की हमशक्ल भी थीं इस कारण शत्रु को धोखा देने के लिए वे
रानी के वेश में भी युद्ध करती थीं। अपने अंतिम समय में भी वे रानी के वेश में युद्ध करते हुए वे अंग्रेज़ों के हाथों
पकड़ी गयीं और रानी को किले से भाग निकलने का अवसर मिल गया। उन्होंने प्रथम स्वाधीनता संग्राम में
झाँसी की रानी के साथ ब्रिटिश सेना के विरुद्ध अद्भुत वीरता से लड़ते हुए ब्रिटिश सेना के कई हमलों को
विफल किया था। यदि लक्ष्मीबाई के सेनानायकों में से एक ने उनके साथ विश्वासघात न किया होता तो झांसी
का किला ब्रिटिश सेना के लिए प्राय: अभेद्य था। झलकारी बाई की गाथा आज भी बुंदेलखंड की लोकगाथाओं
और लोकगीतों में सुनी जा सकती है।
सम्मान
भारत सरकार ने 22 जुलाई, 2001 में झलकारी बाई के सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया है। उनकी
प्रतिमा और एक स्मारक अजमेर, राजस्थान में निर्माणाधीन है, उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा उनकी एक
प्रतिमा आगरा में स्थापित की गयी है, साथ ही उनके नाम से लखनऊ में एक धर्मार्थ चिकित्सालय भी शुरु किया
गया है।
ऐतिहासिक एवं साहित्यिक उल्लेख
मुख्यधारा के इतिहासकारों द्वारा, झलकारी बाई के योगदान को बहुत विस्तार नहीं दिया गया है, लेकिन
आधुनिक स्थानीय लेखकों ने उन्हें गुमनामी से उभारा है। अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल (२१-१०-१९९३ से
१६-०५-१९९९ तक) और श्री माता प्रसाद ने झलकारी बाई की जीवनी की रचना की है। इसके अलावा
चोखेलाल वर्मा ने उनके जीवन पर एक वृहद काव्य लिखा है, मोहनदास नैमिशराय ने उनकी जीवनी को
पुस्तकाकार दिया है और भवानी शंकर विषारद ने उनके जीवन परिचय को लिपिबद्ध किया इतिहास जब भी
लिखा गया है, राजाओं को केन्द्र में रखकर लिखा गया है। राजा उस देश का प्रथम पुरुष होता है। इसलिए राजा
का स्थान इतिहास में शीर्ष पर होता है। इतिहासकारों, कवियों, लेखकों के द्वारा उनका वर्णन नायक के रूप में
किया जाता है। किन्तु द्वितीय लाइन के नायकों का वर्णन कम ही मिलता है। ऐसा नहीं है कि इतिहास ने
बिल्कुल ही उन्हें नकारा हो। इसी प्रकार झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की नियमित सेना में महिलाओं की एक
शाखा थी। जिसकी सेनापति वीरांगना झलकारी बाई थीं। बुंदेलखण्ड की प्रसिद्ध कवयित्री श्रीमती सुभद्राकुमारी
चौहान ने केवल महारानी लक्ष्मीबाई का ही गुणगान किया है। उनकी कविता में झलकारी बाई का कहीं नाम
नहीं आया है। किन्तु राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने झलकारी की बहादुरी को निम्न प्रकार पंक्तिबद्ध किया है – 
जा कर रण में ललकारी थी,
वह तो झाँसी की झलकारी थी ।
गोरों से लडना सिखा गई,
है इतिहास में झलक रही,
वह भारत की ही नारी थी ।। 
राणी झलकारी रणरागिणी

बांदा बुन्देलखण्ड झांसी १८५७ के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम और बाद के स्वतन्त्रता आन्दोलनों में देश के अनेक
वीरो और वीरांगनाओं ने अपनी कु र्बानी दी है। देश की आजादी के लिए शहीद होने वाले ऐसे अनेक वीरो और
वीरांगनाओं का नाम तो स्वर्णक्षरों में अकित है किन्तु बहुत से ऐसे वीर और वीरांगनाये है जिनका नाम इतिहास
में दर्ज नहीं है। तो बहुत से ऐसे भी वीर और वीरांगनाएं है जो इतिहास कारों की नजर में तो नहीं आ पाये
जिससे वे इतिहास के स्वार्णिम पृष्टों में तो दर्ज होने से वंचित रह गये किन्तु उन्हें लोक मान्यता इतनी अधिक
मिली कि उनकी शहादत बहुत दिनों तक गुमनाम नहीं रह सकी । ऐसे अनेक वीरो और वीरांगनाओं का
स्वतन्त्रता संग्राम में दिया गया योगदान धीरे - धीरे समाज के सामने आ रहा है। और अपने शासक झांसी की
रानी लक्ष्मी बाई के प्राण बचाने के लिए स्वयं वीरांगना बलिदान हो जाने वाली वीरांगना झलकारी बाई ऐसी
ही एक अमर शहीद वीरांगना है जिनके योगदान को जानकार लोग बहुत दिन बाद रेखाकित क र पाये है।
झलकारी जैसे हजारों बलिदानी अब भी गुमनामी के अधेरे में खोये है जिनकी खोजकर स्वतंत्रता संग्राम के
इतिहास की भी वृद्धि करने की पहली आवश्यकता है। वीरांगना झलकारी बाई झांसी की रानी लक्ष्मी बाई की
सेना में महिला सेना की सेनापति थी जिसकी शक्ल रानी लक्ष्मी बाई से हुबहू मिलती थी। झलकारी के पति
पूरनलाल रानी झांसी की सेना में तोपची थे। सन् १८५७ के प्रभम स्वतंत्रता संग्राम में अग्रेंजी सेना से रानी
लक्ष्मीबाई के घिर जाने पर झलकारी बाई ने बड़ी सूझ बुझ स्वामिभक्ति और राष्ट्रीयता का परिचय दिया था।
निर्णायक समय में झलकारी बाई ने हम शक्ल होने का फायदा उठाते हुए स्वयं झांसी की रानी लक्ष्मीबाई बन
गयी थी और असली रानी लक्ष्मी बाई को सकुशल झांसी की सीमा से बाहर निकाल दिया था और रानी झांसी
के रूप में अग्रेंजी सेना से लड़ते - लड़ते शहीद हो गयी थी। वीरांगना झलकारी बाई के इस प्रकार झांसी की
रानी के प्राण बचाने अपनी मातृ भूमि झांसी और राष्ट्र की रक्षा के लिए दिये गये बलिदान को स्वतंत्रता संग्राम
का इतिहास भले ही अपनी स्वार्णिम पृष्टों में न समेट सका हो किन्तु झांसी के लोक इतिहासकारो , कवियों ,
लेखकों , ने वीरांगना झलकारी बाई के स्वतंत्रता संग्राम में दिये गये योगदान को श्रृद्धा के साथ स्वीकार किया
है। वीरांगना झलकारी बाई का जन्म २२ नवम्बर १८३० ई० को झांसी के समीप भोजला नामक गांव में एक
सामान्य कोरी परिवार में हुआ था जिसके पिता का नाम सदोवा था। सामान्य परिवार में पैदा होने के कारण
झलकारी बाई को औपचारिक शिक्षा ग्रहण करने का अवसर तो नहीं मिला किन्तु वीरता और साहस झलकारी
में बचपन से विद्यमान था। थोड़ी बड़ी होने पर झलकारी की शादी झांसी के पूरनलाल से हो गयी जो रानी
लक्ष्मीबाई की सेना में तोपची था। प्रारम्भ में झलकारी बाई विशुद्ध घेरलू महिला थी किन्तु सैनिक पति का उस
पर बड़ा प्रभाव पड़ा धीरे - धीरे उसने अपने पति से से सारी सैन्य विद्याएं सीख ली और एक कुशल सैनिक बन
गयी। इस बीच झलकारी बाई के जीवन में कुछ ऐसी घटनाएं घटी जिनमें उसने अपनी वीरता साहस और एक
सैनिक की कुशलता का परिचय दिया। इनकी भनक धीरे - धीरे रानी लक्ष्मीबाई को भी मालूम हुई जिसके
फलस्वरूप रानी ने उन्हें महिला सेना में शामिल कर लिया और बाद से उसकी वीरता साहस को देखते हुए उसे
महिला सेना का सेनापति बना दिया। झांसी के अनेक राजनैतिक घटना क्ररमों के बाद जब रानी लक्ष्मीबाई का
अग्रेंजों के विरूद्ध निर्णायक युद्ध हुआ उस समय रानी की ही सेना का एक विश्वासघाती दूल्हा जू अग्रेंजी सेना से
मिल गया था और झांसी के किले का ओरछा गेट का फाटक खोल दिया जब अग्रेंजी सेना झांसी के किले में कब्जा
करने के लिए घुस पड़ी थी। उस समय रानी लक्ष्मीबाई को अग्रेंजी सेना से घिरता हुआ देख महिला सेना की
सेनापति वीरांगना झलकारी बाई ने बलिदान और राष्ट्रभक्ति की अदभुत मिशाल पेश की थी। झलकारी बाई की
शक्ल रानी लक्ष्मीबाई से मिलती थी ही उसी सूझ बुझ और रण कौशल का परिचय देते हुए वह स्वयं रानी
लक्ष्मीबाई बन गयी और असली झांसी की रानी लक्ष्मीबाई को सकुशल बाहर निकाल दिया और अग्रेंजी सेना से
स्वयं संघर्ष करती रही।
बाद में दूल्हा जी के बताने पर पता चला कि यह रानी लक्ष्मी बाई नहीं बल्कि महिला सेना की सेनापति
झलकारी बाई है जो अग्रेंजी सेना को धोखा देने के लिए रानी लक्ष्मीबाई बन कर लड़ रही है। बाद में वह शहीद
हो गयी। वीरांगना झलकारी बाई के इस बलिदान को बुन्देलखण्ड तो क्या भारत का स्वतन्त्रता संग्राम कभी
भुला नहीं सकता। वीरांगना झलकारी बाई का सबसे पहले उल्लेख बुन्देलखण्ड के सुप्रसिद्ध साहित्यिक
इतिहासकार वृन्दावन लाल वर्मा ने अपने उपन्यास लक्ष्मी बाई में किया था जिससे बाद में धीरे - धीरे अनेक
विद्वानों सहित्यकारों इतिहासकारों ने झलकारी के स्वतन्त्रता संग्राम के योगदान का उदघाटित किया। झलकारी
बाई का विस्तृत इतिहास भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण के प्रकाशन विभाग ने झलकारी बाई शीर्षक से
ही प्रकाशित किया है। बाद में भारत सरकार के पारेट एण्ड टेलीग्राफ विभाग ने २२ जुलाई २००१ को
झलकारी बाई पर डाक टिकट जारी कर उसके योगदान को स्वीकार किया है। झांसी के इतिहास कारों में
अधिकतर ने वीरांगना झलकारी बाई को नियमित स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास में नहीं सम्मलित किया किन्तु
बुन्देली के सुप्रसिद्ध गीतकार महाकवि अवधेश ने झलकारी बाई शीर्षक से एक नाटक लिखकर वीरांगना
झलकारी बाई की ऐतिहासिकता प्रमाणित की है। झलकारी को तो जैसे मन की मुराद मिल गई। उन्हें बंदूक
चलाना और तोपों का प्रशिक्षण दिया गया। झलकारी इन सब में सर्वश्रेष्ठ थी। अंग्रेजों ने रानी के दत्तक पुत्र को
रियासत का वारिस मानने से इन्कार कर दिया और झाँसी को अपने अधीन करने के कुचक्र चलाने प्रारम्भ कर
दिए। स्थिति की गंभीरता को भाँप कर सेनानायक, झाँसी की जनता, रानी के साथ लामबन्द हो गए। झाँसी
अंग्रेजों को थाली में रखकर सौंपने के बजाय उनसे लोहा लेने का निर्णय लिया गया।महारानी लक्ष्मीबाई ने
कुशलता से युद्ध संचालन किया। अंग्रेजों एवं उनके देशी पिट्ठुओं को कई बार शिकस्त दी। पूरन कोली को किले
के एक द्वार की रक्षा करने का दायित्व सौंपा गया। झलकारी बाई रानी की मुख्य सहयोगी की भूमिका में थी।
कहा जाता है भारत में जयचंदों की किसी भी काल में कमी नहीं रही है। झाँसी के एक सेनानायक दूल्हेराव ने
अंग्रेजों से हाथ मिला लिया। युद्ध के निर्णायक दौर में इस विश्वासघाती ने किले का एक द्वार खोल दिया।
फलस्वरूप अंग्रेजी सेना किले में प्रवेश कर गयी। किले का पतन होते ही सेनानायकों एवं झलकारी बाई ने रानी
को सलाह दी कि वह कुछ विश्वस्त सैनिकों के साथ किले के बाहर निकल जायें। रानी ने अपने बच्चे को पीठ पर
बाँध लिया। घोडे पर सवार होकर गुप्त-मार्ग से किले से बाहर हो गई। पूरन कोली उस दुर्ग की रक्षा करते हुए
बुरी तरह घायल हो गया। झलकारी बाई जो अब रानी की भूमिका में युद्ध कर रही थी, पति के घायल होने की
सूचना पाकर विचलित नहीं हुई। उसने साहस तथा धैर्य से शत्रु का सामना किया। रानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजों की
पहुँच से दूर हो जाना चाहती थी। किले में युद्ध की कमान सँभाले झलकारी बाई रानी के वेश में अंग्रेजी सेना पर
शेरनी की तरह टूट पडी। झलकारी ने १२ घंटे तक अनवरत युद्ध किया और अंग्रेज यही समझते रहे कि उनसे
रानी ही युद्ध कर रही है। यकायक झाँसी की सेना पस्त होने लगी। झलकारी को शत्रु ने चारों ओर से घेर लिया
और बंदी बना लिया। उसे जनरल ह्यूरोज के समक्ष प्रस्तुत किया गया। वहाँ झाँसी के एक गद्दार ने पहचान
लिया। उसने अंग्रेजों को बता दिया कि यह रानी लक्ष्मीबाई नहीं बल्कि उनकी दुर्गा दल की नायिका झलकारी
बाई है। जनरल ह्यूरोज जाँबाजों का सम्मान करता था, वह उनसे बहुत प्रभावित हुआ। झलकारी की वीरता
तथा त्याग की प्रशंसा करते हुए उसने कहा - अगर भारत में स्वतंत्रता की दीवानी ऐसी दो चार महिलाएँ और
हो जायें तो अब तक बर्तानियों ने भारत में जो ग्रहण किया है, वह उन्हें छोडना पडेगा।
भारत को स्वतंत्र होने से कोई भी नहीं रोक सकता।
झलकारी बाई का अन्त किस प्रकार हुआ, इस बारे में इतिहासकार मौन हैं। कुछ लोगों का कहना है कि उन्हें
अंग्रेजों द्वारा फाँसी दे दी गई। लेकिन कुछ का कहना है कि उनका अंग्रेजों की कैद में जीवन समाप्त हुआ। अखिल
भारतीय युवा कोली राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. नरेशचन्द्र कोली के अनुसार ४ अप्रैल १८५७ को झलकारी बाई ने
वीरगति प्राप्त की। तत्कालीन इतिहासकारों ने लम्बे समय तक झलकारी बाई के योगदान को नजरअन्दाज
किया, किन्तु बुन्देलखण्ड के अनेक लेखकों ने उनकी शौर्य गाथा गाई हैं। जिनमें चोखेलाल ने उनके जीवन पर
एक वृहद् काव्य लिखा है और भवानी शंकर विशारद ने उनके जीवन परिचय को लिपिबद्ध किया है। झाँसी की
रानी का इतिहास जब-जब लोगों के द्वारा पढा जायगा, झलकारी बाई के योगदान को लोग अवश्य याद करेंगे।
इस श्खला में उत्तर प्रदेश के आगरा शहर में उनकी घोडे पर सवार मूर्ति स्थापित की गई है। लखनऊ में उनके
नाम पर धर्मार्थ चिकित्सालय प्रारम्भ किया गया है। जिससे भविष्य की भारतीय समाज की अनेक पीढयाँ उनसे
देश धर्म पर मर मिट जाने की प्रेरणा लेती रहेंगी।
संदर्भ
वीरांगना झलकारी बाई के इस प्रकार झांसी की रानी के प्राण बचाने अपनी मातृ भाूमि झांसी और राष्ट्र की
रक्षा के लिए दिये गये बलिदान को स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास भले ही अपनी स्वार्णिम पृष्टों में न समेट सका
हो किन्तु झांसी के लोक इतिहासकारो , कवियों , लेखकों , ने वीरांगना झलकारी बाई के स्वतंत्रता संग्राम में
दिये गये योगदान को श्रृद्धा के साथ स्वीकार किया है। लेकिन आधुनिक स्थानीय लेखकों ने उन्हें गुमनामी से
उभारा है। माता प्रसाद ने झलकारी बाई की जीवनी की रचना की। चोखेलाल वर्मा ने उनके जीवन पर एक
वृहद काव्य लिखा है। मोहनदास नैमिशराय ने उनकी जीवनी को पुस्तकाकार दिया है। भवानी शंकर विषारद ने
उनके जीवन परिचय को लिपिबद्ध किया है . राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने पंक्तिबद्ध किया है - श्री माता प्रसाद
चोखेलाल वर्मा ने उनके जीवन पर एक वृहद काव्य लिखा है.

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